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इश्क़ में गिरकर संभलना आ जाता

by SATYADEO KUMAR
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सत्यदेव कुमार

वो मुझे इश्क़ में गिराकर संभाल लेती .
तो गिरकर संभलना आ जाता ।

वो रोज सज्जती -सबरती है
पर मेरी जिंदगी भी सवार देती ,
तो मुझे भी सवरना आ जाता

हद ये है कि हद से ज्यादा चाहता हूँ उसे
पर वो इश्क़ में एक हद भी कर जाती
तो मुझे हद से गुजरना आ जाता

हर मजहब से हर दुआ में उसे माँगता हूँ
और मेरी एक दुआ कबूल हो जाती
तो मैं लौट कर उसके शहर जाता ….
वो मुझे इश्क़ में गिराकर संभाल लेती .
तो गिरकर संभलना आ जाता ।

भूल से भी भूलना नहीं चाहता हूँ उसे
अगर भुलाना भी आ जाता हमें
तो भूलकर भी मैं उसे चाहता ।

वो मुझे हमेशा अपने यादों के दामन से थाम लेती है
नही तो पता नहीं कब -कहाँ बिखर जाता
और ये शिलशिला है उससे इश्क़ में मेरा
वो मिलकर हमसे मुस्कुरा देती
मैं मिलकर संभल जाता

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