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कुछ तो टूटा था जो जुड़ न सका…सत्यदेव कुमार

by SATYADEO KUMAR
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कुछ तो टूटा था जो जुड़ न सका ।
कुछ तो ऐसे रास्ते चल दिया था जो मुड़ न सका ।

एक अजीब सी दिल में चाहत थी
रात थी बिताये पल की यादें साथ थी ।
उनकी तन्हाई थी ,मेरी जुदाई थी ।
पर कुछ तो टूटा था जो जुड़ न सका ।

उनकी वफा साथ थी ,मेरी जफ़ा साथ थी।
कभी घोर अँधेरा था ,क़भी घोर ऊजाला थी ।
कभी बूँद-बूँद सी  दिल में सिसक थी ।
कभी प्यार से भरी दिल में जोरों की धधक थी ।
पर दिल में कुछ बगाबत थी जो मुड़ न सका ।
तू लाख वफ़ा सही पर जुड़ न सका ।

लोग कहते हैं कि हम टूट गए हैं ।
हम उन्हें कैसे बातये की अपने दिल से ही लूट गये हैं ।
और उन्हें कैसे बातये की हम अपने आप से रूठ गये हैं
टुटा कुछ जो भी हो पर,अब भी दिल में इश्क़ की बूंदे है
पर अब राही था किसी और मंजिल का जो मुड़ न सका
कुछ तो टुटा था जो जुड़ न सका ।

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