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ना मैं अपना घर का रहा ,

by SATYADEO KUMAR
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ना मैं अपना घर का रहा ||

ना मैं अपना घर का रहा !
ना हीं अपना शहर का रहा !
जिस शहर में रहनें चला!
ना उस शहर का रहा.
बस अब अपनें घर और शहर की यादें रह गई !
दोस्तों और यारों के वादे रह गई !
ना यहाँ सुकून मिल पाया !
ना हीं वहाँ ठहर पाया !
जेह्न में वस दिल की फरियादें रह गई !
अजिब पल है वहाँ खुश था
और खुशी के चाहत में दुर निकला !
जो खुश था वह यहाँ -वहाँ में खुशीयाँ गुम हो गई !
वहाँ तो चाय से भी खुश था !
यहाँ तो शराब भी कम हो गई !
लौटना चाहता हुँ धर और अपनें शहर की और
पर कुछ खुशियों की सौगात लेकर !
पराये हुए पलों की बात लेकर !
मिटाना चाहता हुँ वर्षों की थकान !
अपनों से दुरी के यादों के साथ लेकर !
तडप रहाता हुँ बडी -बडी इमारतों में !
खडा होना चाहता हुँ !
फिर से वहीं खेत -खलिहान और वर्षोतों में !
लिपट कर सिमट जाना चाहता हुँ !
अपने शहर की गलियों के ज्जबातों में !
चुमना चाहता हुँ बो दरवाजे !
जो बंद हो चुका है आधी रातों में !
लुटना चाहता हुँ वही खुशी !
जो छत पे खडा रह यारों के साथ बर्षोंतों में!
जोडना चाहता हुँ वहीं पंतगे !
जो कट चुका है बेऱूखी हवा के लातों में !
पर क्या करूँ फिलहाल कुछ कर नहीं सकता !
बिना पहुँच पाये मुकाम के मुलाकातों में!
बस आह भर के रह जाता हुुँ
धर और शहर की यादों की वर्षोंतों में!
इसी तरह जि रहा हुँ जिंदगी और कह रहा हूँ
ना हीं अपना घर का रहा
ना हीं अपनें शहर का रहा!
जिस शहर में रहनें चला !
ना हीं उस शहर का रहा !

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