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मजबूर हूँ ,,मजदूर हूँ …..(सत्यदेव कुमार)

by SATYADEO KUMAR
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majboor hu , majdoor hu

मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हुँ ।
समाज का बोझ उठाता हूँ ।
धूप में भी पसीने से खुद को ठंडक पहुंचाता हूँ
ये समाज भलें हीं न समझे हमें ।
मैं इनके लिए गंदी नाली में भी मौत की नींद सो जाता हूँ ।
लोगों को लगता है मैं अपना परिवार का पेट चलाता हूँ ।
पर मैं मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हुँ ।
मैं गाँव के खेत के खलिहान से ।
शहर के आलीशान तक सजाता हूँ ।
खूद तो कभी कभी नमक रोटी से काम चलाता हूँ
पर आपके लिए हमेशा कुछ स्पेशल बनाता हूँ ।
पर मैं लाचारी में भूखा भी सो जाता हूँ।
हाँ मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हुँ ।
मैं लंबी -चौड़ी सड़कें बनाता हूँ ।
पर उस पे लंबी गाड़ी नहीं चलाता हूँ ।
दुसरों के लिए महलों पे महल बनाता हूँ ।
पर खूद की झोपड़ी सीधी भी नहीं कर पाता हूँ
मैं दूसरों के लिए बनाता चला जाता हूँ ।
खूद सिर्फ बनकर रह जाता हूँ ।
हाँ मैं मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हुँ ।
इस समाज में सभी जगह मैं व्याप्त हूँ ।
किसी की आह बनकर हूँ ।
किसी के वाह बनकर हूँ ।
नेता के वोट के लिए विशेष बनकर हूँ ।
हर अमीर का अवशेष बनकर हूँ ।
हाँ मैं मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हुँ ।
मेरी मजबूरी तो देखिए ।
अपनें दर्द को सिमटकर अखबार हूँ
तो कभी कवि की कविता का इजहार हूँ ।
हाँ मैं मजदूरी करने पर मजबूर हूँ ।
हाँ मजदूर हूँ ।

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